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Sunday, January 27, 2013

जैसे पैदा होना एक घटना है, वैसे ही मृत्यु भी एक अवश्य घटने वाली घटना है, जो अपने समय पर सभी के साथ घटती ही है। वह निश्चित है, जब उसका समय आएगा, वह घट जाएगी। पहले से ही उसके बारे में क्यों सोचा जाए! हमें जीवन अपने आप मिला है, मौत भी अपने आप हो जाएगी। हमारा तो बीच का समय है, जिसके हर पल को हमें पूरी जागरूकता व प्रसन्नता के साथ जीना है।
श्रवण शक्ति कमजोर हो चुकने के बाद बुजुर्ग पिता का जोर से बोलना आपकी चिढ़ का कारण बन जाता है लेकिन उस समय आप ये भूल जाते हैं कि ये वही पिता हैं, जो बुखार आने पर रात-रातभर आपके सिरहाने बैठे रहे थे या आपके एक महंगे खिलौने की मांग पर जिन्होंने अपने वेतन से अग्रिम लिया था।

Saturday, January 26, 2013

यह शरीर तो मल, मूत्र, पसीना, खून से भरा हुआ मांस का लोथड़ा है। जब आप सुबह सोकर उठते हैं तो देखिए शरीर के हर द्वार से गंदगी ही बाहर निकल रही है। इस गंदगी से भरे शरीर के प्रति इतना लगाव क्यों? इसकी बजाय शरीर को धारण करने वाली सत्ता को देखें, उससे प्रेम करें, जो आपके और सामने वाले में एक ही है। शरीर में भेद है लेकिन शरीरों को चलाने वाली चेतना में भेद नहीं।
जो तुम अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो। और जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के लिए भी मत चाहो।

Friday, January 25, 2013

मन

मन के स्वभाव को अगर हम समझ लें, तब मन हमें परेशान नहीं करेगा, क्योंकि मन कभी हमारा मित्र होता है, कभी शत्रु। कभी यह हमें छोटा बना देता है, कभी बड़ा। कभी करुणा से भर जाता है, कभी क्रोध से। कभी यह चींटी जैसा छोटा हो जाता है, कभी हाथी जैसा बड़ा। कभी किसी के फेवर में आ जाता है, कभी उसका विरोधी बन जाता है। कभी एक-एक रुपया बचाने की बात करता है, कभी सैकड़ों एकदम लुटा देता है। कभी राग करता है, कभी द्वेष करने लगता है। कभी प्यार से भर जाता है, कभी घृणा से।

कभी पाप कर्मों की ओर जाना चाहता है, कभी पुण्य कर्मों की ओर। इस तरह से मन कभी ऊंचाइयों की ओर ले जाता है, कभी नीचे गिरा देता है।

अगर जिंदगी में सब कुछ अनुकूल है तो भी मन दुख को तलाशता रहता है। मन कभी खाली नहीं रहता। या तो हम मन को कहीं लगाएं वरना मन खुद ही भूत या भविष्यकाल में दौड़ जाता है। पहले कुछ खराब घटा हो, उसके बारे में सोचकर दुखी होने लगता है कि ऐसा न होता तो ऐसा हो जाता, ऐसा न बोलता, तो अपने पराए न होते

अपनों के साथ-साथ सबके लिए मन में अच्छी भावना रखनी जरूरी है। जो भी आपके सामने आए, उसके लिए भी प्रेम और जिसका ख्याल आए, उसके लिए भी प्रेम। भले आप किसी के लिए सीधे तौर पर कुछ मदद न कर पाएं, लेकिन अपने भीतर उसके लिए अच्छा भाव तो रख ही सकते हैं।

हमारी कोशिश इस मन को ट्रेंड करने की होनी चाहिए क्योंकि मन बिना सिखाए कुछ नहीं सीखता। इसके लिए अभ्यास की जरूरत होती है और अभ्यास है मन को वर्तमान में रखना, हमेशा मुस्कुराते रहना, सबके प्रति शुक्रिया का भाव रखना। इससे मन धीरे-धीरे सधने लगता है और अंदर आत्मविश्वास, सकारात्मकता व उमंग पैदा होने लगती है। फिर जीवन सुखमय हो जाता है।
 हमारा नजरिया हमारे व्यक्तित्व का आईना होता है। अगर हम किसी की कमियों को देखना शुरू करते हैं, तब उसमें हमें केवल बुराइयां ही दिखाई देती हैं, अच्छाइयां नहीं। लेकिन अच्छाइयां देखना शुरू करें, तब हमें उसकी केवल अच्छाइयां ही दिखाई देंगी। अगर नजरिए में सकारात्मकता है, तब जीवन में मधुरता रहेगी।

Thursday, January 24, 2013

एक पुष्प कहीं भी रखा जाए, अपनी सुंगध हर दिशा में फैलाएगा ही। उसी तरह तुम्हारी भक्ति की सुगंध हर क्षेत्र में फैलेगी। भक्ति ही किसी को कर्तव्यनिष्ठ और सेवापरायण बनाती है।