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Thursday, January 24, 2013

तुम्हारी भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि तुम्हारे कर्म, प्रवृत्ति और व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। वह केवल एक भावना नहीं है, वह चेतना का एक उत्कृष्ट और सार्वभौमिक गुण है। ईश्वर को प्रेम करने वाले, उसके प्रति निष्ठा रखने वाले इस संपूर्ण विश्व को भी प्रेम करते हैं, क्योंकि यह जगत ईश्वर से ही व्याप्त है। जीवात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। यही अद्वैत ज्ञान है।

Wednesday, January 23, 2013

जीवन की सार्थकता


हमारे जीवन में प्रयास, पुरुषार्थ, अवरोध एवं संघर्ष का लगातार एक क्रम चलता रहता है। और ऐसे में सफलताएं भी मिलती हैं और विफलताएं भी। इन सब के बीच व्यक्ति की जीवन यात्रा उत्थान की दिशा में बढ़ रही है या पतन की दिशा में, इसमें उस व्यक्ति के दृष्टिकोण की भूमिका सबसे बड़ी होती है।

यदि हम छोटी-छोटी असफलताओं और रुकावटों से हिम्मत हार बैठते हैं और नकारात्मक भावों को जीवन में हावी होने देते हैं, तो यात्रा का हर कदम दूभर एवं कष्टप्रद बन जाता है। जीवन एक दुखद घटना एवं दुर्भाग्यपूर्ण मजाक लगने लगता है। हमारी ऊर्जा कुंठित होने लगती है।

हम में से अधिकांश लोग ऐसी स्थिति में अपने दुख-दर्द एवं दुर्भाग्य के लिए भाग्य को कोसते हैं या फिर दूसरों को दोषी मानते हैं। और नहीं तो भगवान पर ही गुस्सा निकालने लगते हैं।। जैसे ही हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगता है, तो स्थिति पलटने लगती है। आशा मनुष्य की सबसे बड़ी संपदा है।

प्रेमचंद ने एक जगह लिखा है, आशा उत्साह की जननी है। उसमें तेज है, बल है, जीवन है। आशा ही संसार की संचालन शक्ति है। यदि व्यक्ति आशा खो बैठता है तो जीवन नैया डूबने लगती है। आशा घोर अभाव और संकट के बीच भी निर्माण के तत्वों की खोज करती है। वह आभासित अभिशाप को भी वरदान में बदल देती है। ठीक इसके उलट , निराशावादी दृष्टिकोण के कारण हम अनुकूल अवसरों में भी प्रतिकूलता देखने लगते हैं। एडीसन आशावादी था , उसने अनुकूल अवसर खोजकर अपने जीवन को नए सिरे से शुरू कर लिया।

इसलिए यदि घटनाएं हमारे अनुरूप नहीं घटतीं और हमें विफलता एवं निराशा का संदेश देती हैं , तो भी हिम्मत हारने एवं हताश होने की आवश्यकता नहीं। चाहे संघर्ष पथ पर हम गिर जाएं , पिट भी जाएं , तो भी यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती। यदि लक्ष्य के प्रति मन में लगन हो , तो विफलता भी गिर कर फिर से उठकर खड़े होने और दुगुने उत्साह के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

आशावादी व्यक्ति व्यावहारिक रुख अपनाते हुए अपने जीवन की छोटी - छोटी सफलताओं से क्रमश : आगे बढ़ता है। अपनी कार्यकुशलता और इच्छाशक्ति को क्रमश : विकसित करता जाता है। यह पद्धति रचनात्मकता का स्रोत बनकर उसे लगातार आगे बढ़ाती रहती है। निराशावादी व्यक्ति जहां एक दरवाजा बंद देखते ही अपना प्रयास छोड़ देता है , वहीं आशावादी व्यक्ति दूसरे खुले दरवाजों की तलाश में जुट जाता है। निराशावादी जहां सतत हारता है , वहीं आशावादी अपनी तात्कालिक विफलताओं के बावजूद एक विजेता बन कर उभरता है।

वास्तव में जब तक हम अपने जीवन के अर्थ एवं सुख की खोज के लिए बाहरी वस्तुओं , व्यक्तियों एवं परिस्थितियों पर निर्भर रहते हैं , तब तक निराशा का भाव भी बार - बार आता है। और जब दृष्टि अपने अंदर के मूल स्रोत की ओर मुड़ने लगती है , तो निराशा का कुहासा भी घटने लगता है।

यहीं पर हमें परमात्मा की कृपा एवं वरदान की भाव भरी अनुभूति होती है। अपने ईमानदार प्रयास के साथ प्रभु प्रेम एवं उसके अचूक न्याय विधान के प्रति आस्था को धारण कर हम अनायास ही आस्तिकता एवं धार्मिकता के पथ पर बढ़ जाते हैं। वही हमें जीवन की सार्थकता के बोध की ओर ले चलती है

2013 का स्वागत


2013 का स्वागत एक वास्तविक मुस्कुराहट के साथ करें, एक ऐसी मुस्कुराहट जो भीतर से हो। कलैंडर के पन्ने पलटने के साथ साथ हम अपने मन के पन्नों को भी पलटते जाएं । प्रायः हमारी डायरी स्मृतियों से भरी हुई होती है। ध्यान दें कि आपकी आने वाली तारीखें बीती हुई घटनाओं से न भर जाएं। बीते हुए समय से कुछ सीखें, कुछ भूलें और आगे बढ़ें।

वर्तमान जीवन के अनुभव को आपका भूतकाल नष्ट न करने पाएं। भूतकाल को क्षमा कर दें। यदि आप अपने बीते हुए समय को क्षमा नहीं कर पाएंगे तो आप का भविष्य दुःखपूर्ण हो जाएगा।  भूत को छोड़ कर नया जीवन शुरू करने का संकल्प करें।

इस बार नववर्ष के आगमन पर हम इस पृथ्वी के लिए शांति तथा संपन्नता के संकल्प के साथ सभी को शुभकामनाएं दें।  समाज के लिए कुछ अच्छा करने का संकल्प लें, जो पीड़ित हैं उन्हें धीरज दें।

जब भी आप लोगों के लिए उपयोगी हुए तो उसका पुण्य भी आपको मिला- वह लुप्त नहीं होता। आपके द्वारा किए गए अच्छे कर्म हमेशा पलट कर आपके पास वापस आएंगे।

 सच्चा आध्यात्मिक पहलू जाति, धर्म, तथा राष्ट्रीयता की संकुचित सीमाओं को तोड़ देता है तथा सभी में व्याप्त जीवन ऊर्जा से अवगत कराता है।

अपनी आंखों को खोलें और देखें की आपको कितना कुछ मिला हुआ है। इस नव वर्ष पर यह ध्यान दें कि आपको क्या मिला है, इस पर नहीं कि आपको क्या नहीं मिला। य

जब आप नि:स्वार्थ सेवा करते हैं तो आपको कितना अधिक संतोष मिलता है। इससे आपको यह भी पता चलेगा कि आपकी अपनी समस्या बहुत छोटी हैं। बार-बार मन में कहना कि 'मुझे क्या मिलेगा?'मानसिक अवसाद का सबसे बड़ा कारण है। 'मुझे क्या मिलेगा?' समृद्धि की कमी का लक्षण है।

इस वर्ष पंछी की तरह मुक्त हो जाएं। अपने पंखों को खोलें और उड़ना सीखें।  आप अपनी स्वतंत्रता को कब महसूस करेंगे? मरने के बाद? अभी इसी क्षण मुक्त हो जायें। बैठ कर तृप्त हो जाएं। कुछ समय ध्यान और सत्संग में बैठें। यह आपके मन को शांत तो करता ही है और साथ ही संसार की चुनौतियों का सामना करने के लिए आपकी चेतना को आंतरिक बल देता है।

जब मन विश्राम करता है तब बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है। जब मन आकांक्षा, ज्वर या इच्छा जैसी छोटी-छोटी चीज़ों से भरा हो तब बुद्धि क्षीण हो जाती है।  केन्द्रित रहने से हमेशा खुशी पास रहती है। इसी शांति से प्रतिभाएं उभरती हैं। सहज ज्ञान मिल जाता है, सुंदरता आ जाती है, शांति आती है, प्रेम प्रकट होता है। समृद्धि आती है।

प्रेम

सारी सृष्टि का आधार है सर्वव्यापक परमेश्वर और उसकी बनायी इस सृष्टि का नियामक, शासक बल है स्नेह, विशुद्ध प्रेम। निःस्वार्थ स्नेह यह सत्य, धर्म, कर्म सभी का श्रृंगार है अर्थात् ये सब तभी शोभा पाते हैं जब स्नेहयुक्त हों।

जीवन का कोई भी रिश्ता-नाता स्नेह के सात्त्विक रंग से वंचित न हो। भाई-बहन का नाता, पिता-पुत्र का, माँ-बेटी का, सास-बहू का, पति-पत्नी का, चाहे कोई भी नाता क्यों न हो, स्नेह की मधुर मिठास से सिंचित होने पर वह और भी सुंदर, आनंददायी एवं हितकारी हो जाता है।


आज हमारा दृष्टिकरण बदल रहा है। टी.वी. के कारण हम लोगों पर आधुनिकता का रंग चढ़ गया है। रहन-सहन, खानपान की शैली कुछ और ही हो गयी है। स्वार्थ की भावना, इन्द्रियलोलुपता, विषय-विकार और संसारी आकर्षण की भावना बढ़ रही है। जो नाश हो रहा है उसी की वासना बढ़ रही है। बड़ों के प्रति आदर और आस्था का अभाव हो रहा है। व्यक्ति कर्तव्य-कर्म से विमुख होते जा रहे हैं। सुख-सुविधा, भोग-संग्रह, मान-बड़ाई में मारे-मारे फिर रहे हैं। ऐसों की मान-बड़ाई टिकती नहीं और श्री रामकृष्ण, रमण महर्षि जैसों का मान-बड़ाई मिटती नहीं। परमार्थ-पथ का पता ही नहीं है, अतः एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई है। ईर्ष्या, भेद-भावना बढ़ गयी है।

मोह बांधने वाला होता है, जबकि प्रेम खिलाने वाला। जो प्रेम नहीं करता, उसका व्यक्तित्व हमेशा सिमटा रहता है। वह डरा और बुझा-सा रहता है। प्रेम तो झरने की तरह है, जो हर वक्त बहता रहता है। उस बहाव को हम खुद रोककर सीमाओं में बांधते हैं, जबकि प्रेम हमारी चेतना का स्वरूप है। जैसे नदी लगातार बिना रुके बहती रहती है, वैसे ही प्रेम नदी के समान हमारे भीतर से बहता रहता है। हम उसके बहाव में अपने विकारों की रुकावट डाल देते हैं। अगर विकारों की रुकावट हटाई जाए तो प्रेम अपनी सुगंध फैलाना शुरू कर देगा।

हमारा काम है रास्ते की रुकावटों को दूर करना। फिर देखना, प्रेमभाव का फव्वारा भीतर फूट पडे़गा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि भीतर प्रेमभाव न आए। दिन भर किसी अपने पर, अनजाने पर, किसी चीज पर, प्रकृति पर, पशु-पक्षी या जानवर पर प्रेम भाव तो आता ही है, लेकिन हम उसे रोकते रहते हैं बार-बार रोकते रहने से वह कम हो जाता है, जिससे लगने लगता है कि हम सूखे हैं, अंदर प्रेम है ही नहीं।




प्रेम को हम समझ ही नहीं पाते, क्योंकि प्रेम को हम अपनों तक सीमित रखते हैं। सीमा में होने के कारण प्रेम दूषित होकर मोह बन जाता है। मोह बांधने वाला होता है, जबकि प्रेम खिलाने वाला।
एक पुष्प कहीं भी रखा जाए, अपनी सुंगध हर दिशा में फैलाएगा ही। उसी तरह तुम्हारी भक्ति की सुगंध हर क्षेत्र में फैलेगी। भक्ति ही किसी को कर्तव्यनिष्ठ और सेवापरायण बनाती है।

Wednesday, September 28, 2011

उपासना के नौ दिन

उपासना के नौ दिन




(पूज्य बापू जी के सत्संग से)



(शारदीय नवरात्रिः 28 सितम्बर से 5 अक्तूबर 2011)



नवरात्रि में शुभ संकल्पों को पोषित करने, रक्षित करने और शत्रुओं को मित्र बनाने वाले मंत्र की सिद्धि का योग होता है। वर्ष में दो नवरात्रियाँ आती हैं। शारदीय नवरात्रि और चैत्री नवरात्रि। चैत्री नवरात्रि के अंत में रामनवमी आती है और दशहरे को पूरी होने वाली नवरात्रि के अंत में राम जी का विजय-दिवस विजयादशमी आता है। एक नवरात्रि के आखिरी दिन राम जी प्रागट्य होता है और दूसरी नवरात्रि आती तब रामजी की विजय होती है, विजयादशमी मनायी जाती है। इसी दिन समाज को शोषित करने वाले, विषय-विकार को सत्य मानकर रमण करने वाले रावण का श्रीरामजी ने वध किया था।



नवरात्रि को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है। इसमें पहले तीन दिन तमस को जीतने की आराधना के हैं। दूसरे तीन दिन रजस् को और तीसरे दिन सत्त्व को जीतने की आराधना के हैं। आखिरी दिन दशहरा है। वह सत्त्व-रज-तम तीन गुणों को जीत के जीव को माया के जाल से छुड़ाकर शिव से मिलाने का दिन है। शारदीय नवरात्रि विषय-विकारों में उलझे हुए मन पर विजय पाने के लिए और चैत्री नवरात्रि रचनात्मक संकल्प, रचनात्मक कार्य, रचनात्मक जीवन के लिए, राम-प्रागट्य के लिए हैं।



नवरात्रि के प्रथम तीन दिन होते हैं माँ काली की आराधना करने के लिए, काले (तामसी) कर्मों की आदत से ऊपर उठने के लिए लिए। पिक्चर देखना, पानमसाला खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, काम-विकार में फिसलना – इन सब पाशविक वृत्तियों पर विजय पाने के लिए नवरात्रि के प्रथम तीन दिन माँ काली की उपासना की जाती है।



दूसरे तीन दिन सुख-सम्पदा के अधिकारी बनने के लिए हैं। इसमें लक्ष्मी जी की उपासना होती है। नवरात्रि के तीसरे तीन दिन सरस्वती की आराधना-उपासना के हैं। प्रज्ञा तथा ज्ञान का अर्जन करने के लिए हैं। हमारे जीवन में सत्-स्वभाव, ज्ञान-स्वभाव और आनन्द-स्वभाव का प्रागट्य हो। बुद्धि व ज्ञान का विकास करना हो तो सूर्यदेवता का भ्रूमध्य में ध्यान करें। विद्यार्थी सारस्वत्य मंत्र का जप करें। जिनको गुरुमंत्र मिला है वे गुरुमंत्र का, गुरुदेव का, सूर्यनारायण का ध्यान करें।



आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक का पर्व शारदीय नवरात्रि के रूप में जाना जाता है। यह व्रत-उपवास, आद्यशक्ति माँ जगदम्बा के पूजन-अर्चन व जप-ध्यान का पर्व है। यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है। देवी की उपासना के लिए तो नौ दिन हैं लेकिन जिन्हें ईश्वरप्राप्ति करनी है उनके लिए तो सभी दिन हैं।



स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 11, अंक 225



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पूज्य बापू जी का आत्मसाक्षात्कार दिवसः 29 सितम्बर 2011

पूज्य बापू जी का आत्मसाक्षात्कार दिवसः




29 सितम्बर 2011



जितना हो सके आप लोग मौन का सहारा लेना। बोलना पड़े तो बहुत धीरे बोलना और बार-बार अपने मन को समझाना, 'तेरा आसोज सुद दो दिवस (आत्मसाक्षात्कार-दिवस) कब होगा ? ऐसा क्षण कब आयेगा कि जिस क्षण तू परमात्मा में खो जायेगा ? ऐसी घड़ियाँ कब आयेगी कि तू सर्वव्यापक, सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप हो जायेगा ?



ऐसी घड़ियाँ कब आयेंगी कि जब निःसंकल्प अवस्था को प्राप्त हो जायेंगे ? योगी योग करते हैं और धारणा रखते हैं दिव्य शरीर पाने की लेकिन वह दिव्य शरीर भी प्रकृति का होता है, अंत में नाश हो जाता है। मुझे न दिव्य शरीर पाना है, न दिव्य भोग भोगने हैं, न दिव्य लोकों में जाना है, न दिव्य देव-देह ही पाकर विलास करना है। मैं तो सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हूँ, मेरा मुझको नमस्कार है – ऐसा मुझे कब अनुभव होगा ? जो सबके भीतर है, सबके पास है, सबका आधार है, सबका प्यारा है, सबसे न्यारा है, ऐसे सच्चिदानन्द परमात्मा में मेरा मन विश्रान्त कब होगा ? – ऐसा सोचते-सोचते मन को विश्रान्ति की तरफ ले जाना। ज्यों-ज्यों मन विश्रान्ति को उपलब्ध होगा त्यों-त्यों तुम्हारा तो बेड़ा पार हो ही जायेगा, तुम्हारा दर्शन करने वाले का भी बेड़ा पार होने लगेगा।



आत्मसाक्षात्कार के समय जो होता है उसको वाणी में नहीं लाया जा सकता है। योग की पराकाष्ठा दिव्य देह पाना है, भक्ति की पराकाष्ठा भगवान के लोक में जाना है, धर्मानुष्ठान की पराकाष्ठा स्वर्ग-सुख भोगना है लेकिन तत्त्वज्ञान की पराकाष्ठा है अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में जो फैल रहा चैतन्य है, जिसमें कोटि-कोटि ब्रह्मा होकर लीन हो जाते हैं, जिसमें कोटि-कोटि इन्द्र राज्य करके भी नष्ट हो जाते हैं, जिसमें अरबों और खरबों राजा उत्पन्न होकर लीन हो जाते हैं, उस चैतन्यस्वरूप से अपने-आपका ऐक्य अनुभव करना। यह आत्मसाक्षात्कार की खबर है।



धर्म, भक्ति, योग व साक्षात्कार में क्या अन्तर है यह समझना चाहिए। धर्म अधर्म से बचने के काम आता। भक्ति भाव को शुद्ध करने के काम आती है। भोग हर्ष पैदा करने के काम आते हैं। योग हर्ष व शोक को दबाने के काम आता है, मन व इन्द्रियों को शुद्ध करने में काम आता है लेकिन आत्मसाक्षात्कार इन सबसे ऊँची चीज है। उसके इर्द-गिर्द का बातें शास्त्रों में थोड़ी-बहुत आती हैं। धर्म से स्वर्गादि की उपलब्धि होती है, स्वर्ग में जाना पड़ता है। भक्ति से वैकुण्ठ में जाना पड़ता है सुख लेने के लिए। योग से दिव्य देह पाने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है किंतु साक्षात्कार सारे कर्तव्य छुड़ा देता है।



साक्षात्कार का अर्थ है कि जो सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा है, उसमें मन का भलीभाँति तदाकार हो जाना। जैसे तरंग समुद्र से तदाकार हो जाती है, ऐसे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मविद् हो जाता है। उसकी वाणी वेदवाणी हो जाती है। लौकिक भाषा हो या संस्कृत, भ्रम-भेद मिटाकर अभेद आत्मा में जगा देती है। साक्षात्कार कैसा होता है इसके बारे में कितना भी प्रयत्न किया जाय, उसका पूर्ण वर्णन नहीं हो सकता है। अन्य साधनाओं का फल लोक-लोकांतर में जाकर कुछ पाने का होता है लेकिन आत्मसाक्षात्कार के बाद कहीं जाकर कुछ पाना नहीं रहता। कुछ पाना भी नहीं रहता, कुछ खोना भी नहीं रहता। धर्मात्मा यदि अधर्म करेगा तो उसका पुण्य नष्ट हो जायेगा। योगी यदि दुराचार करेगा तो उसका योगबल नष्ट हो जायेगा। भक्त यदि भगवान की भक्ति छोड़ देगा तो अभक्त हो जायेगा। साक्षात्कार का मतलब एक बार साक्षात्कार हो जाये, फिर वह तीनों लोकों को मान डाले फिर भी उसको पाप नहीं लगता और तीनों लोकों को भंडारा करके भोजन कराये तो भी उसको पुण्य नहीं होता। क्योंकि वह एक ऐसी जगह, ऐसी ऊँचाई पर पहुँचा है कि वहाँ पुण्य नहीं पहुँचता, पाप भी नहीं पहुँचता। वह ऐसी ऊँचाई पर खड़ा है कि वहाँ धर्म भी नहीं पहुँचता और अधर्म भी नहीं पहुँचता है। वह आत्मवेत्ता एक ऐसी जगह पर खड़ा है। अखा भगत कहते हैं-



राज्य करे रमणी रमें, के ओढ़े मृगछाल।



जो करे सब सहज में, सो साहेब का लाल।।



यह आत्मज्ञान भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सुनाते हैं- त्रैगुण्यविषया वेदा..... 'वेदों का ज्ञान, वेदों की उपलब्धियाँ भी तीन गुणों के अन्तर्गत हैं। निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। 'अर्जुन ! तू तीनों गुणों से पार चला जा।'



ज्ञानी क्या होता है ? वह सत्त्वगुण भी नहीं चाहता। भक्त सत्त्वगुण चाहता है, भोगी रजोगुण चाहता है, आलसी तमोगुण चाहता है। आलसी तमोगुण में सुख ढूँढता है, भोगी रजोगुण में सुख ढूँढता है और भक्त सत्त्वगुण में – ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था.... वह सात्त्विक लोकों में जाता है। ज्ञानी आत्मा को जानने से तीनों गुणों और तीनों लोकों को काकविष्ठा जैसा जान लेता है।



कबीरा मन निर्मल भयो, जैसे गंगा नीर।



पीछे पीछे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।



ज्ञानी का अर्थ है कि जिसके पीछे-पीछे ईश्वर भी घूम ले। भक्त का अर्थ है कि जो भगवान के पीछे घूमे। भोगी का अर्थ है कि जो भोग के पीछे घूमे। भोगी का अर्थ है कि जो भोग के पीछे घूमे। योगी का अर्थ है कि जो दिव्य देह पाने के पीछे घूमे। अभी घूमना बाकी है। साक्षात्कार का अर्थ है कि बस.....



जानना था वो ही जाना, काम क्या बाकी रहा ?



लग गया पूरा निशाना, काम क्या बाकी रहा ?



देह के प्रारब्ध से मिलता है सबको सब कुछ।



नाहक जग को रिझाना, काम क्या बाकी रहा ?



लाख चौरासी के चक्कर से थका, खोली कमर।



अब रहा आराम पाना, काम क्या बाकी रहा ?



साक्षात्कार का मतलब है पूर्ण विश्रान्ति, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण शांति, पूर्ण उपलब्धि ! पूर्ण तो एक परमात्मा है। गुरुकृपा से परमात्मा के सत्यत्व को, परमात्मा के चेतनत्व को, परमात्मा के आनंदत्व को, परमात्मा के अमिट तत्त्व को जानकर अपनी देह के गर्व, अभिमान और अपनी देह की कृति तुच्छ मान के उसमें कर्तृत्वभाव को अलविदा कर देना, इसका नाम है 'साक्षात्कार'। भोग में है तो भोगी भोग से मिलता है। त्याग में है तो त्यागी त्याग करता है। तपस्वी भी लोकांतर में सुख से मिलता है लेकिन साक्षात्कार का अर्थ है कि ईश्वर से ईश्वर से मिले। देवो भूत्वा यजेद् देवम्।



निर्वासनिक हो तुम ईश्वर हो। निश्चिंत हो तो तुम ईश्वर हो। यदि देह की मैल तुम्हारे में नहीं है और तुम अपने को आत्मभाव से प्रकट कर सको तो तुममें और ईश्वर में फर्क नहीं है। यदि देह के साथ जुड़ गये तो तुम्हारे और ईश्वर में बड़ा फासला है। भोग के साथ जुड़ गये, स्वर्ग के साथ जुड़ गये, धन के साथ जुड़ गये, कुछ पाने का साथ जुड़ गये तो भिखारी हो और कुछ पाने की इच्छा नहीं है, अपने आपको, तुमने खो दिया तो समझो साक्षात्कार। साक्षात्कार का अर्थ है कि कहीं भी मस्त न होना –



देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।



न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।



खुद पर, अपने आत्मा पर जब चित्त मस्त हो जाय, अपने-आप में जब आप विश्रान्ति पाने लगो, आपके आगे स्वर्ग फीका हो जाये, आपके आगे वैकुंठ फीका हो जाये, आपके आगे प्रधानमंत्री का पद तो क्या होता है, इन्द्र-पद, ब्रह्माजी का पद भी फीका हो जाये तो समझो की साक्षात्कार हो गया।



भक्त लोग ब्रह्म, विष्णु, महेश के लोक में जाते हैं। तपस्वी तप करके स्वर्ग जाते हैं। साक्षात्कार का अर्थ है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का जो पद है, वह भी तुच्छ भासने लग जाये। इससे बढ़कर साधना की पराकाष्ठा नहीं हो सकती, इससे बढ़कर कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। आत्मसाक्षात्कार आखिरी उपलब्धि है।



स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 2,12 अंक 225