मेरी हो सो जल जाय, तेरी हो
सो रह जाय। हमारी जो अहंता, ममता और वासना है वह जल जाए। गुरुजी! आपकी जो
करुणा और ज्ञानप्रसाद है वही रह जाए। तत्परता से सेवा करते हैं तो आदमी की
वासनाएं नियंत्रित हो जाती हैं और ईश्वरप्राप्ति की भूख लगती है। प्रमाणभूत
है कि जगत नष्ट हो रहा है। संसार का कितना भी कुछ मिल जाए लेकिन
परमात्म-पद को पाए बिना इस जीवात्मा का जन्म-मरण का दुःख जाएगा नहीं।
Tuesday, April 9, 2013
Monday, February 4, 2013
जिसकी मिट्टी है, अग्नि है, पानी है, जो हमारे
दिल की धड़कनें चला रहा है, आँखों को देखने की, कानों को सुनने की, मन को
सोचने की, बुद्धि को निर्णय करने की शक्ति दे रहा है, निर्णय बदल जाते हैं
फिर भी जो बदले हुए निर्णय को जानने का ज्ञान दे रहा है, वह परमात्मा हमारा
है। मरने के बाद भी वह हमारे साथ रहता है, उसके लिए हमने क्या किया ? उसको
हम कुछ नहीं दे सकते ? प्रीतिपूर्वक स्मरण करते करते
प्रेममय नहीं हो सकते? बेवफा, गुणचोर होने के बदले शुक्रगुजारी और स्नेहपूर्वक स्मरण क्या अधिक कल्याणकारी नहीं होगा ? हे बेवकूफ मानव ! हे गुणचोर मनवा !! सो क्यों बिसारा जिसने सब दिया ? जिसने गर्भ में रक्षा की, सब कुछ दिया, सब कुछ किया, भर जा धन्यवाद से, अहोभाव से उसके प्रीतिपूर्वक स्मरण में !
प्रेममय नहीं हो सकते? बेवफा, गुणचोर होने के बदले शुक्रगुजारी और स्नेहपूर्वक स्मरण क्या अधिक कल्याणकारी नहीं होगा ? हे बेवकूफ मानव ! हे गुणचोर मनवा !! सो क्यों बिसारा जिसने सब दिया ? जिसने गर्भ में रक्षा की, सब कुछ दिया, सब कुछ किया, भर जा धन्यवाद से, अहोभाव से उसके प्रीतिपूर्वक स्मरण में !
अपने कर्तव्य का तत्परतापूर्वक पालन और दूसरे के अधिकारों की प्रेमपूर्वक
रक्षा-यही पारिवारिक व सामाजिक जीवन में उन्नति का सूत्र है। और भी स्पष्ट
रूप से कहें तो ʹअपने लिए कुछ न चाहो और भगवद्भाव से दूसरों की सेवा करो।ʹ
यही पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक उन्नति का महामंत्र है। क्या
आप इसका आदर कर इसे अपने जीवन में उतारेंगे ? यदि हाँ तो आपका जन्म-कर्म
दिव्य हो ही गया मानो।
रक्षा-यही पारिवारिक व सामाजिक जीवन में उन्नति का सूत्र है। और भी स्पष्ट
रूप से कहें तो ʹअपने लिए कुछ न चाहो और भगवद्भाव से दूसरों की सेवा करो।ʹ
यही पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक उन्नति का महामंत्र है। क्या
आप इसका आदर कर इसे अपने जीवन में उतारेंगे ? यदि हाँ तो आपका जन्म-कर्म
दिव्य हो ही गया मानो।
हर जीव का वास्तविक घर तो भगवान का धाम ही है। यह धरातल तो
रैन - बसेरा की तरह है जहां पर कुछ समय के लिये जीव ठहरता है।
जो अपना नहीं , उसको हम अपना बताते हैं। यह घर , यह परिवार और
यह धन इत्यादि सब यहीं रह जाना है। अगर यह हमारा होता तो
हमारे साथ ही चले जाना चाहिए था। वास्तव में हम भ्रम में जी
कर इनकी पालना कर रहे हैं , जबकि हमें पालना करनी चाहिये अपने
वास्तविक ध्येय की। क्या है वास्तविक ध्येय ? यह ध्येय है भगवान की भक्ति।
धन कमाना , परिवार बनाना और उसकी देखभाल करना अनुचित नहीं है , परंतु उसमें बहुत अधिक आसक्त हो जाना ठीक नहीं है। अपनी असली पहचान को समझें। अपने वास्तविक संबंधी यानि भगवान से अपने संबंध को मजबूत करें।
वास्तविक ध्येय की। क्या है वास्तविक ध्येय ? यह ध्येय है भगवान की भक्ति।
धन कमाना , परिवार बनाना और उसकी देखभाल करना अनुचित नहीं है , परंतु उसमें बहुत अधिक आसक्त हो जाना ठीक नहीं है। अपनी असली पहचान को समझें। अपने वास्तविक संबंधी यानि भगवान से अपने संबंध को मजबूत करें।
Thursday, January 31, 2013
एक मछली, अपनी साथी मछलियों से पूछा करती थी,
मैं हमेशा सागर का नाम सुनती हूं। यह सागर है क्या? और कहां है? मैं उसे
कहां तलाशूं? मछली सागर में ही रहती थी, वहीं खाती-पीती और सोती थी। वहीं
उसका जन्म हुआ था, और मृत्यु भी सागर में ही निश्चित थी। पर सागर का उसे
पता नहीं था, क्योंकि उसकी विशालता को न वो देख सकती थी और न पहचान सकती
थी। छोटी सी थी, तो दूर तक तैर कर भी उसके दायरे का अंदाजा नहीं लगा सकती
थी। कुछ उसी मछली जैसा हाल हमारा भी है... ऐसे ही विश्व रूप ब्रह्म में हम
हैं और वह हम में है, फिर भी उसे तलाशते रहते हैं।
Wednesday, January 30, 2013
मेरी हो सो जल जाय, तेरी हो सो रह जाय। हमारी जो
अहंता, ममता और वासना है वह जल जाए। गुरुजी! आपकी जो करुणा और ज्ञानप्रसाद
है वही रह जाए। तत्परता से सेवा करते हैं तो आदमी की वासनाएं नियंत्रित हो
जाती हैं और ईश्वरप्राप्ति की भूख लगती है। प्रमाणभूत है कि जगत नष्ट हो
रहा है। संसार का कितना भी कुछ मिल जाए लेकिन परमात्म-पद को पाए बिना इस
जीवात्मा का जन्म-मरण का दुःख जाएगा नहीं।
Tuesday, January 29, 2013
परीक्षाएं
वो जीवन जीने योग्य नहीं, जिसमें परीक्षाएं न हों। जीवन एक निरंतर
चलनेवाली परीक्षा है। जिंदगी का हर लम्हा किसी न किसी तरह की परीक्षा है।
इसमें जो जितना तपा, वह उतना खरा कुंदन बना।
हर व्यक्तिहर परीक्षा में सफल होना चाहता है। इसलिए परीक्षा चाहे जैसी भी हो, उसके लिए उचित तैयारी करनी चाहिए। बिना तैयारी के परीक्षा देना ऐसा ही है, जैसे बिना तैरना सीखे गहरे पानी में उतरना। बिना सीखे कोई गहरे पानी में तो दूर, उथले पानी में भी नहीं उतरता।
तैराकी पानी में ही सीखी जा सकती है, पानी के बिना नहीं। लेकिन इसका प्रारंभ घनघोर गर्जन करते समुद्र अथवा विपुल जल राशि युक्त महानद में संभव नहीं। इसका प्रारंभ तो शांत उथले जल में ही संभव है। जीवन की परीक्षाओं के लिए भी ऐसा ही परिवेश चाहिए।
जिंदगी की वास्तविक परीक्षाएं विषम परिस्थितियों में ही होती हैं। जिस प्रकार परिश्रमी विद्यार्थी परीक्षा भवन से विजयी होकर लौटते हैं और अपने आत्म सम्मान में वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार जो व्यक्ति समय-प्रबंधन और आत्म-प्रबंधन द्वारा जीवन में आने वाली विभिन्न परीक्षाओं की पहले से तैयारी रखते हैं, वे सफलता पाते हैं। इससे उनका आत्म विश्वास बढ़ता है। उनके भीतर आशावादी दृष्टि पैदा होती है। और वे हौसले से आगे बढ़ते हैं।
हर व्यक्तिहर परीक्षा में सफल होना चाहता है। इसलिए परीक्षा चाहे जैसी भी हो, उसके लिए उचित तैयारी करनी चाहिए। बिना तैयारी के परीक्षा देना ऐसा ही है, जैसे बिना तैरना सीखे गहरे पानी में उतरना। बिना सीखे कोई गहरे पानी में तो दूर, उथले पानी में भी नहीं उतरता।
तैराकी पानी में ही सीखी जा सकती है, पानी के बिना नहीं। लेकिन इसका प्रारंभ घनघोर गर्जन करते समुद्र अथवा विपुल जल राशि युक्त महानद में संभव नहीं। इसका प्रारंभ तो शांत उथले जल में ही संभव है। जीवन की परीक्षाओं के लिए भी ऐसा ही परिवेश चाहिए।
जिंदगी की वास्तविक परीक्षाएं विषम परिस्थितियों में ही होती हैं। जिस प्रकार परिश्रमी विद्यार्थी परीक्षा भवन से विजयी होकर लौटते हैं और अपने आत्म सम्मान में वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार जो व्यक्ति समय-प्रबंधन और आत्म-प्रबंधन द्वारा जीवन में आने वाली विभिन्न परीक्षाओं की पहले से तैयारी रखते हैं, वे सफलता पाते हैं। इससे उनका आत्म विश्वास बढ़ता है। उनके भीतर आशावादी दृष्टि पैदा होती है। और वे हौसले से आगे बढ़ते हैं।
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