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Wednesday, September 28, 2011

उपासना के नौ दिन

उपासना के नौ दिन




(पूज्य बापू जी के सत्संग से)



(शारदीय नवरात्रिः 28 सितम्बर से 5 अक्तूबर 2011)



नवरात्रि में शुभ संकल्पों को पोषित करने, रक्षित करने और शत्रुओं को मित्र बनाने वाले मंत्र की सिद्धि का योग होता है। वर्ष में दो नवरात्रियाँ आती हैं। शारदीय नवरात्रि और चैत्री नवरात्रि। चैत्री नवरात्रि के अंत में रामनवमी आती है और दशहरे को पूरी होने वाली नवरात्रि के अंत में राम जी का विजय-दिवस विजयादशमी आता है। एक नवरात्रि के आखिरी दिन राम जी प्रागट्य होता है और दूसरी नवरात्रि आती तब रामजी की विजय होती है, विजयादशमी मनायी जाती है। इसी दिन समाज को शोषित करने वाले, विषय-विकार को सत्य मानकर रमण करने वाले रावण का श्रीरामजी ने वध किया था।



नवरात्रि को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है। इसमें पहले तीन दिन तमस को जीतने की आराधना के हैं। दूसरे तीन दिन रजस् को और तीसरे दिन सत्त्व को जीतने की आराधना के हैं। आखिरी दिन दशहरा है। वह सत्त्व-रज-तम तीन गुणों को जीत के जीव को माया के जाल से छुड़ाकर शिव से मिलाने का दिन है। शारदीय नवरात्रि विषय-विकारों में उलझे हुए मन पर विजय पाने के लिए और चैत्री नवरात्रि रचनात्मक संकल्प, रचनात्मक कार्य, रचनात्मक जीवन के लिए, राम-प्रागट्य के लिए हैं।



नवरात्रि के प्रथम तीन दिन होते हैं माँ काली की आराधना करने के लिए, काले (तामसी) कर्मों की आदत से ऊपर उठने के लिए लिए। पिक्चर देखना, पानमसाला खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, काम-विकार में फिसलना – इन सब पाशविक वृत्तियों पर विजय पाने के लिए नवरात्रि के प्रथम तीन दिन माँ काली की उपासना की जाती है।



दूसरे तीन दिन सुख-सम्पदा के अधिकारी बनने के लिए हैं। इसमें लक्ष्मी जी की उपासना होती है। नवरात्रि के तीसरे तीन दिन सरस्वती की आराधना-उपासना के हैं। प्रज्ञा तथा ज्ञान का अर्जन करने के लिए हैं। हमारे जीवन में सत्-स्वभाव, ज्ञान-स्वभाव और आनन्द-स्वभाव का प्रागट्य हो। बुद्धि व ज्ञान का विकास करना हो तो सूर्यदेवता का भ्रूमध्य में ध्यान करें। विद्यार्थी सारस्वत्य मंत्र का जप करें। जिनको गुरुमंत्र मिला है वे गुरुमंत्र का, गुरुदेव का, सूर्यनारायण का ध्यान करें।



आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक का पर्व शारदीय नवरात्रि के रूप में जाना जाता है। यह व्रत-उपवास, आद्यशक्ति माँ जगदम्बा के पूजन-अर्चन व जप-ध्यान का पर्व है। यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है। देवी की उपासना के लिए तो नौ दिन हैं लेकिन जिन्हें ईश्वरप्राप्ति करनी है उनके लिए तो सभी दिन हैं।



स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 11, अंक 225



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पूज्य बापू जी का आत्मसाक्षात्कार दिवसः 29 सितम्बर 2011

पूज्य बापू जी का आत्मसाक्षात्कार दिवसः




29 सितम्बर 2011



जितना हो सके आप लोग मौन का सहारा लेना। बोलना पड़े तो बहुत धीरे बोलना और बार-बार अपने मन को समझाना, 'तेरा आसोज सुद दो दिवस (आत्मसाक्षात्कार-दिवस) कब होगा ? ऐसा क्षण कब आयेगा कि जिस क्षण तू परमात्मा में खो जायेगा ? ऐसी घड़ियाँ कब आयेगी कि तू सर्वव्यापक, सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप हो जायेगा ?



ऐसी घड़ियाँ कब आयेंगी कि जब निःसंकल्प अवस्था को प्राप्त हो जायेंगे ? योगी योग करते हैं और धारणा रखते हैं दिव्य शरीर पाने की लेकिन वह दिव्य शरीर भी प्रकृति का होता है, अंत में नाश हो जाता है। मुझे न दिव्य शरीर पाना है, न दिव्य भोग भोगने हैं, न दिव्य लोकों में जाना है, न दिव्य देव-देह ही पाकर विलास करना है। मैं तो सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हूँ, मेरा मुझको नमस्कार है – ऐसा मुझे कब अनुभव होगा ? जो सबके भीतर है, सबके पास है, सबका आधार है, सबका प्यारा है, सबसे न्यारा है, ऐसे सच्चिदानन्द परमात्मा में मेरा मन विश्रान्त कब होगा ? – ऐसा सोचते-सोचते मन को विश्रान्ति की तरफ ले जाना। ज्यों-ज्यों मन विश्रान्ति को उपलब्ध होगा त्यों-त्यों तुम्हारा तो बेड़ा पार हो ही जायेगा, तुम्हारा दर्शन करने वाले का भी बेड़ा पार होने लगेगा।



आत्मसाक्षात्कार के समय जो होता है उसको वाणी में नहीं लाया जा सकता है। योग की पराकाष्ठा दिव्य देह पाना है, भक्ति की पराकाष्ठा भगवान के लोक में जाना है, धर्मानुष्ठान की पराकाष्ठा स्वर्ग-सुख भोगना है लेकिन तत्त्वज्ञान की पराकाष्ठा है अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में जो फैल रहा चैतन्य है, जिसमें कोटि-कोटि ब्रह्मा होकर लीन हो जाते हैं, जिसमें कोटि-कोटि इन्द्र राज्य करके भी नष्ट हो जाते हैं, जिसमें अरबों और खरबों राजा उत्पन्न होकर लीन हो जाते हैं, उस चैतन्यस्वरूप से अपने-आपका ऐक्य अनुभव करना। यह आत्मसाक्षात्कार की खबर है।



धर्म, भक्ति, योग व साक्षात्कार में क्या अन्तर है यह समझना चाहिए। धर्म अधर्म से बचने के काम आता। भक्ति भाव को शुद्ध करने के काम आती है। भोग हर्ष पैदा करने के काम आते हैं। योग हर्ष व शोक को दबाने के काम आता है, मन व इन्द्रियों को शुद्ध करने में काम आता है लेकिन आत्मसाक्षात्कार इन सबसे ऊँची चीज है। उसके इर्द-गिर्द का बातें शास्त्रों में थोड़ी-बहुत आती हैं। धर्म से स्वर्गादि की उपलब्धि होती है, स्वर्ग में जाना पड़ता है। भक्ति से वैकुण्ठ में जाना पड़ता है सुख लेने के लिए। योग से दिव्य देह पाने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है किंतु साक्षात्कार सारे कर्तव्य छुड़ा देता है।



साक्षात्कार का अर्थ है कि जो सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा है, उसमें मन का भलीभाँति तदाकार हो जाना। जैसे तरंग समुद्र से तदाकार हो जाती है, ऐसे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मविद् हो जाता है। उसकी वाणी वेदवाणी हो जाती है। लौकिक भाषा हो या संस्कृत, भ्रम-भेद मिटाकर अभेद आत्मा में जगा देती है। साक्षात्कार कैसा होता है इसके बारे में कितना भी प्रयत्न किया जाय, उसका पूर्ण वर्णन नहीं हो सकता है। अन्य साधनाओं का फल लोक-लोकांतर में जाकर कुछ पाने का होता है लेकिन आत्मसाक्षात्कार के बाद कहीं जाकर कुछ पाना नहीं रहता। कुछ पाना भी नहीं रहता, कुछ खोना भी नहीं रहता। धर्मात्मा यदि अधर्म करेगा तो उसका पुण्य नष्ट हो जायेगा। योगी यदि दुराचार करेगा तो उसका योगबल नष्ट हो जायेगा। भक्त यदि भगवान की भक्ति छोड़ देगा तो अभक्त हो जायेगा। साक्षात्कार का मतलब एक बार साक्षात्कार हो जाये, फिर वह तीनों लोकों को मान डाले फिर भी उसको पाप नहीं लगता और तीनों लोकों को भंडारा करके भोजन कराये तो भी उसको पुण्य नहीं होता। क्योंकि वह एक ऐसी जगह, ऐसी ऊँचाई पर पहुँचा है कि वहाँ पुण्य नहीं पहुँचता, पाप भी नहीं पहुँचता। वह ऐसी ऊँचाई पर खड़ा है कि वहाँ धर्म भी नहीं पहुँचता और अधर्म भी नहीं पहुँचता है। वह आत्मवेत्ता एक ऐसी जगह पर खड़ा है। अखा भगत कहते हैं-



राज्य करे रमणी रमें, के ओढ़े मृगछाल।



जो करे सब सहज में, सो साहेब का लाल।।



यह आत्मज्ञान भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सुनाते हैं- त्रैगुण्यविषया वेदा..... 'वेदों का ज्ञान, वेदों की उपलब्धियाँ भी तीन गुणों के अन्तर्गत हैं। निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। 'अर्जुन ! तू तीनों गुणों से पार चला जा।'



ज्ञानी क्या होता है ? वह सत्त्वगुण भी नहीं चाहता। भक्त सत्त्वगुण चाहता है, भोगी रजोगुण चाहता है, आलसी तमोगुण चाहता है। आलसी तमोगुण में सुख ढूँढता है, भोगी रजोगुण में सुख ढूँढता है और भक्त सत्त्वगुण में – ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था.... वह सात्त्विक लोकों में जाता है। ज्ञानी आत्मा को जानने से तीनों गुणों और तीनों लोकों को काकविष्ठा जैसा जान लेता है।



कबीरा मन निर्मल भयो, जैसे गंगा नीर।



पीछे पीछे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर।।



ज्ञानी का अर्थ है कि जिसके पीछे-पीछे ईश्वर भी घूम ले। भक्त का अर्थ है कि जो भगवान के पीछे घूमे। भोगी का अर्थ है कि जो भोग के पीछे घूमे। भोगी का अर्थ है कि जो भोग के पीछे घूमे। योगी का अर्थ है कि जो दिव्य देह पाने के पीछे घूमे। अभी घूमना बाकी है। साक्षात्कार का अर्थ है कि बस.....



जानना था वो ही जाना, काम क्या बाकी रहा ?



लग गया पूरा निशाना, काम क्या बाकी रहा ?



देह के प्रारब्ध से मिलता है सबको सब कुछ।



नाहक जग को रिझाना, काम क्या बाकी रहा ?



लाख चौरासी के चक्कर से थका, खोली कमर।



अब रहा आराम पाना, काम क्या बाकी रहा ?



साक्षात्कार का मतलब है पूर्ण विश्रान्ति, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण शांति, पूर्ण उपलब्धि ! पूर्ण तो एक परमात्मा है। गुरुकृपा से परमात्मा के सत्यत्व को, परमात्मा के चेतनत्व को, परमात्मा के आनंदत्व को, परमात्मा के अमिट तत्त्व को जानकर अपनी देह के गर्व, अभिमान और अपनी देह की कृति तुच्छ मान के उसमें कर्तृत्वभाव को अलविदा कर देना, इसका नाम है 'साक्षात्कार'। भोग में है तो भोगी भोग से मिलता है। त्याग में है तो त्यागी त्याग करता है। तपस्वी भी लोकांतर में सुख से मिलता है लेकिन साक्षात्कार का अर्थ है कि ईश्वर से ईश्वर से मिले। देवो भूत्वा यजेद् देवम्।



निर्वासनिक हो तुम ईश्वर हो। निश्चिंत हो तो तुम ईश्वर हो। यदि देह की मैल तुम्हारे में नहीं है और तुम अपने को आत्मभाव से प्रकट कर सको तो तुममें और ईश्वर में फर्क नहीं है। यदि देह के साथ जुड़ गये तो तुम्हारे और ईश्वर में बड़ा फासला है। भोग के साथ जुड़ गये, स्वर्ग के साथ जुड़ गये, धन के साथ जुड़ गये, कुछ पाने का साथ जुड़ गये तो भिखारी हो और कुछ पाने की इच्छा नहीं है, अपने आपको, तुमने खो दिया तो समझो साक्षात्कार। साक्षात्कार का अर्थ है कि कहीं भी मस्त न होना –



देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।



न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।



खुद पर, अपने आत्मा पर जब चित्त मस्त हो जाय, अपने-आप में जब आप विश्रान्ति पाने लगो, आपके आगे स्वर्ग फीका हो जाये, आपके आगे वैकुंठ फीका हो जाये, आपके आगे प्रधानमंत्री का पद तो क्या होता है, इन्द्र-पद, ब्रह्माजी का पद भी फीका हो जाये तो समझो की साक्षात्कार हो गया।



भक्त लोग ब्रह्म, विष्णु, महेश के लोक में जाते हैं। तपस्वी तप करके स्वर्ग जाते हैं। साक्षात्कार का अर्थ है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का जो पद है, वह भी तुच्छ भासने लग जाये। इससे बढ़कर साधना की पराकाष्ठा नहीं हो सकती, इससे बढ़कर कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। आत्मसाक्षात्कार आखिरी उपलब्धि है।



स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 2,12 अंक 225

Wednesday, February 16, 2011

गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई।

संसार का छोटे-से-छोटा कार्य भी सीखने के लिए कोई न कोई तो गुरू चाहिए और फिर बात अगर जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार करने की आती है तो उसमें सदगुरू की आवश्यकता क्यों न होगी भैया ?

मेरे आश्रम में एक महंत रहता है। मुझे एक बार सत्संग के लिए कहीं जाना था। मैंने उस महंत से कहाः "रोटी तुम अपने हाथों से बना लेना, आटा-सामान यहाँ पड़ा है।"
उसने कहाः "ठीक है।"

वह पहले एक सेठ था, बाद में महंत बन गया। तीन दिन के बाद जब मैं कथा करके लौटा तो महंत से पूछाः "कैसा रहा? भोजन बनाया था कि नहीं?"

महंतः "आटा भी खत्म और रोटी एक भी नहीं खाई।"
मैंने पूछाः "क्यों, क्या हुआ?"

महंतः "एक दिन आटा थाल में लिया और पानी डाला तो रबड़ा हो गया। फिर सोचाः थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर बनाऊँ तो बने ही नहीं। फिर सोचाः वैसे भी रोटी बनाते हैं तो आटा ही सिकता है तो क्यों न तपेली में डालकर जरा हलवा बना लें ? हलवा बनाने गया तो आटे में गाँठें ही गाँठें हो गई तो गाय को दे दिया। फिर सोचाः चलो मालपूआ जैसा कुछ बनावें लेकिन स्वामी जी ! कुछ जमा ही नहीं। आटा सब खत्म हो गया और रोटी का एक ग्रास भी नहीं खा पाया।"

जब आटा गूँथने और सब्जी बनाने के लिए भी बेटी को, बहू को किसी न किसी से सीखना पड़ता है तो जीवात्मा का भी यदि परमात्मा का साक्षात्कार करना है तो अवश्य ही सदगुरू से सीखना ही पड़ेगा।

गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई।
चाहे विरंचि संकर सम होई।।

Tuesday, February 15, 2011

संसार-सागर

कोई सैलानी समुद्र में सैर करने गया। नाव पर सैलानी ने नाविक से पूछाः "तू इंग्लिश जानता है?"

नाविकः "भैया ! इंग्लिश क्या होता है?"

सैलानीः "इंग्लिश नहीं जानता? तेरी 25 प्रतिशत जिंदगी बरबाद हो गयी। अच्छा... यह तो बता कि अभी मुख्यमंत्री कौन है?"

नाविकः "नहीं, मैं नहीं जानता।"

सैलानीः "राजनीति की बात नहीं जानता? तेरी 25 प्रतिशत जिंदगी और भी बेकार हो गयी। अच्छा...... लाइट हाउस में कौन-सी फिल्म आयी
है, यह बता दे।"

नाविकः "लाइट हाउस-वाइट हाउस वगैरह हम नहीं जानते। फिल्में देखकर चरित्र और जिंदगी बरबाद करने वालों में से हम नहीं हैं।"

सैलानीः "अरे ! इतना भी नहीं जानते? तेरी 25 प्रतिशत जिंदगी और बेकार हो गयी।"

इतने में आया आँधी तूफान। नाव डगमगाने लगी। तब नाविक ने पूछाः

"साहब ! आप तैरना जानते हो?"

सैलानीः "मैं और तो सब जानता हूँ, केवल तैरना नहीं जानता।"

नाविकः "मेरे पास तो 25 प्रतिशत जिंदगी बाकी है। मैं तैरना जानता हूँ अतः किनारे लग जाऊँगा लेकिन आपकी तो सौ प्रतिशत जिंदगी डूब
जायगी।"

ऐसे ही जिसने बाकी सब तो जाना किन्तु संसार-सागर को तरना नहीं जाना उसका तो पूरा जीवन ही डूब गया।

भगवान कहते हैं-

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। 
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।। 

"मैं तेरे लिए इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को संपूर्णता से कहूँगा कि जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं बचता।"'

Monday, February 14, 2011

जया एकादशी

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा : भगवन् ! कृपा करके यह बताइये कि माघ मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है, उसकी विधि क्या है तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ?



भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजेन्द्र ! माघ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम जयाहै वह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है पवित्र होने के साथ ही पापों का नाश करनेवाली तथा मनुष्यों को भाग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है इतना ही नहीं , वह ब्रह्महत्या जैसे पाप तथा पिशाचत्व का भी विनाश करनेवाली है इसका व्रत करने पर मनुष्यों को कभी प्रेतयोनि में नहीं जाना पड़ता इसलिए राजन् ! प्रयत्नपूर्वक जयानाम की एकादशी का व्रत करना चाहिए



एक समय की बात है स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र राज्य करते थे देवगण पारिजात वृक्षों से युक्त नंदनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे पचास करोड़ गन्धर्वों के नायक देवराज इन्द्र ने स्वेच्छानुसार वन में विहार करते हुए बड़े हर्ष के साथ नृत्य का आयोजन किया गन्धर्व उसमें गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा उसका पुत्र - ये तीन प्रधान थे चित्रसेन की स्त्री का नाम मालिनी था मालिनी से एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जो पुष्पवन्ती के नाम से विख्यात थी पुष्पदन्त गन्धर्व का एक पुत्र था, जिसको लोग माल्यवान कहते थे माल्यवान पुष्पवन्ती के रुप पर अत्यन्त मोहित था ये दोनों भी इन्द्र के संतोषार्थ नृत्य करने के लिए आये थे इन दोनों का गान हो रहा था इनके साथ अप्सराएँ भी थीं परस्पर अनुराग के कारण ये दोनों मोह के वशीभूत हो गये चित्त में भ्रान्ति गयी इसलिए वे शुद्ध गान गा सके कभी ताल भंग हो जाता था तो कभी गीत बंद हो जाता था इन्द्र ने इस प्रमाद पर विचार किया और इसे अपना अपमान समझकर वे कुपित हो गये



अत: इन दोनों को शाप देते हुए बोले : मूर्खो ! तुम दोनों को धिक्कार है ! तुम लोग पतित और मेरी आज्ञाभंग करनेवाले हो, अत: पति पत्नी के रुप में रहते हुए पिशाच हो जाओ



इन्द्र के इस प्रकार शाप देने पर इन दोनों के मन में बड़ा दु: हुआ वे हिमालय पर्वत पर चले गये और पिशाचयोनि को पाकर भयंकर दु: भोगने लगे शारीरिक पातक से उत्पन्न ताप से पीड़ित होकर दोनों ही पर्वत की कन्दराओं में विचरते रहते थे एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाची से कहा : हमने कौन सा पाप किया है, जिससे यह पिशाचयोनि प्राप्त हुई है ? नरक का कष्ट अत्यन्त भयंकर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दु: देनेवाली है अत: पूर्ण प्रयत्न करके पाप से बचना चाहिए



इस प्रकार चिन्तामग्न होकर वे दोनों दु: के कारण सूखते जा रहे थे दैवयोग से उन्हें माघ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी की तिथि प्राप्त हो गयी जयानाम से विख्यात वह तिथि सब तिथियों में उत्तम है उस दिन उन दोनों ने सब प्रकार के आहार त्याग दिये, जल पान तक नहीं किया किसी जीव की हिंसा नहीं की, यहाँ तक कि खाने के लिए फल तक नहीं काटा निरन्तर दु: से युक्त होकर वे एक पीपल के समीप बैठे रहे सूर्यास्त हो गया उनके प्राण हर लेने वाली भयंकर रात्रि उपस्थित हुई उन्हें नींद नहीं आयी वे रति या और कोई सुख भी नहीं पा सके



सूर्यादय हुआ, द्वादशी का दिन आया इस प्रकार उस पिशाच दंपति के द्वारा जयाके उत्तम व्रत का पालन हो गया उन्होंने रात में जागरण भी किया था उस व्रत के प्रभाव से तथा भगवान विष्णु की शक्ति से उन दोनों का पिशाचत्व दूर हो गया पुष्पवन्ती और माल्यवान अपने पूर्वरुप में गये उनके हृदय में वही पुराना स्नेह उमड़ रहा था उनके शरीर पर पहले जैसे ही अलंकार शोभा पा रहे थे



वे दोनों मनोहर रुप धारण करके विमान पर बैठे और स्वर्गलोक में चले गये वहाँ देवराज इन्द्र के सामने जाकर दोनों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया



उन्हें इस रुप में उपस्थित देखकर इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ ! उन्होंने पूछा: बताओ, किस पुण्य के प्रभाव से तुम दोनों का पिशाचत्व दूर हुआ है? तुम मेरे शाप को प्राप्त हो चुके थे, फिर किस देवता ने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया है?’



माल्यवान बोला : स्वामिन् ! भगवान वासुदेव की कृपा तथा जयानामक एकादशी के व्रत से हमारा पिशाचत्व दूर हुआ है



इन्द्र ने कहा : तो अब तुम दोनों मेरे कहने से सुधापान करो जो लोग एकादशी के व्रत में तत्पर और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय होते हैं



भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण एकादशी का व्रत करना चाहिए नृपश्रेष्ठ ! जयाब्रह्महत्या का पाप भी दूर करनेवाली है जिसने जयाका व्रत किया है, उसने सब प्रकार के दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया इस माहात्म्य के पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है

माँ-बाप को भूलना नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस 14 feb 2011

माँ-बाप को भूलना नहीं

भूलो सभी को मगर, माँ-बाप को भूलना नहीं।

उपकार अगणित हैं उनके, इस बात को भूलना नहीं।।

पत्थर पूजे कई तुम्हारे, जन्म के खातिर अरे।

पत्थर बन माँ-बाप का, दिल कभी कुचलना नहीं।।

मुख का निवाला दे अरे, जिनने तुम्हें बड़ा किया।

अमृत पिलाया तुमको जहर, उनको उगलना नहीं।।

कितने लड़ाए लाड़ सब, अरमान भी पूरे किये।

पूरे करो अरमान उनके, बात यह भूलना नहीं।।

लाखों कमाते हो भले, माँ-बाप से ज्यादा नहीं।

सेवा बिना सब राख है, मद में कभी फूलना नहीं।।

सन्तान से सेवा चाहो, सन्तान बन सेवा करो।

जैसी करनी वैसी भरनी, न्याय यह भूलना नहीं।।

सोकर स्वयं गीले में, सुलाया तुम्हें सूखी जगह।

माँ की अमीमय आँखों को, भूलकर कभी भिगोना नहीं।।

जिसने बिछाये फूल थे, हर दम तुम्हारी राहों में।

उस राहबर के राह के, कंटक कभी बनना नहीं।।

धन तो मिल जायेगा मगर, माँ-बाप क्या मिल पायेंगे?

पल पल पावन उन चरण की, चाह कभी भूलना नहीं।।

Sunday, February 13, 2011

'मातृ-पितृ पूजन दिवस 14 feb 2011 (कैसे मनायें 'मातृ-पितृ पूजन दिवस'? )

दिनांक 14 फरवरी को अपने-अपने घर में अथवा सामूहिक रूप से विद्यालय में आयोजन कर 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' मनायें। बाल संस्कार केन्द्र शिक्षक अपने केन्द्र में बच्चों के माता-पिता को बुलाकर सामूहिक कार्यक्रम कर सकते हैं।



कैसे मनायें 'मातृ-पितृ पूजन दिवस'?

माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बैठायें।

बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें।

तत्पश्चात् माता-पिता के सिर पर पुष्प अर्पण करें तथा फूलमाला पहनायें।

माता-पिता भी बच्चे-बच्चियों के माथे पर तिलक करें एवं सिर पर पुष्प रखें। फिर अपने गले की फूलमाला बच्चों को पहनायें।
बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरू में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें।

बच्चे-बच्चियाँ अपने माता-पिता के एवं माता-पिता बच्चों के सिर पर अक्षत एवं पुष्पों की वर्षा करें।
तत्पश्चात् बच्चे-बच्चियाँ अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करें।

बच्चे-बच्चियाँ अपने माता-पिता को झुककर विधिवत प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतान को प्रेम से सहलायें। संतान अपने माता-पिता के गले लगे। बेटे-बेटियाँ अपने माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों से ईश्वरीय अंश देखें।

इस दिन बच्चे-बच्चियाँ पवित्र संकल्प करें- "मैं अपने माता-पिता व गुरुजनों का आदर करूँगा/करूँगी। मेरे जीवन को महानता के रास्ते ले जाने वाली उनकी आज्ञाओं का पालन करना मेरा कर्तव्य है और मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा/करूँगी।"

इस समय माता-पिता अपने बच्चों पर स्नेहमय आशीष बरसाये एवं उनके मंगलमय जीवन के लिए इस प्रकार शुभ संकल्प करें- "तुम्हारे जीवन में उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति व पराक्रम की वृद्धि हो। तुम्हारा जीवन माता-पिता एवं गुरू की भक्ति से महक उठे। तुम्हारे कार्यों में कुशलता आये। तुम त्रिलोचन  बनो – तुम्हारी बाहर की आँख के साथ भीतरी विवेक की कल्याणकारी आँख जागृत हो। तुम पुरूषार्थी बनो और हर क्षेत्र में सफलता तुम्हारे चरण चूमे।"

बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता को 'मधुर-प्रसाद' खिलायें एवं माता-पिता अपने बच्चों को प्रसाद खिलायें।

Friday, February 11, 2011

खोजो तो उस बालक का नाम जिसने मातृ-पितृ-गुरू भक्ति की ऐसी पावन मिसाल कायम की।

वर्तमान युग का एक बालक बचपन में देर रात तक अपने पिताश्री के चरण दबाता था। उसके पिता जी उसे बार-बार कहते - बेटा! अब सो जाओ। बहुत रात हो गयी है। फिर भी वह प्रेम पूर्वक आग्रह करते हुए सेवा में लगा रहता था। उसके पूज्य पिता अपने पुत्र की अथक सेवा से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देते -

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम।
अपनी माताश्री की भी उसने उनके जीवन के आखिरी क्षण तक खूब सेवा की।

युवावस्था प्राप्त होने पर उस बालक भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की भांति गुरू के श्रीचरणों में खूब आदर प्रेम रखते हुए सेवा तपोमय जीवन बिताया। गुरूद्वार पर सहे वे कसौटी-दुःख उसके लिए आखिर परम सुख के दाता साबित हुए। आज वही बालक महान संत के रूप में विश्ववंदनीय होकर करोड़ों-करोड़ों लोगों के द्वारा पूजित हो रहा है। ये महापुरूष अपने सत्संग में यदा-कदा अपने गुरूद्वार के जीवन प्रसंगों का जिक्र करके कबीरजी का यह दोहा दोहराते हैं -

गुरू के सम्मुख जाये के सहे कसौटी दुःख। कह कबीर ता दुःख पर कोटि वारूँ सुख।।
सदगुरू जैसा परम हितैषी संसार में दूसरा कोई नहीं है। आचार्यदेवो भव, यह शास्त्र-वचन मात्र वचन नहीं है। यह सभी महापुरूषों का अपना अनुभव है।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। यह सूत्र इन महापुरूष के जीवन में मूर्तिमान बनकर प्रकाशित हो रहा है और इसी की फलसिद्धि है कि इनकी पूजनीया माताश्री व सदगुरूदेव - दोनों ने अंतिम क्षणों में अपना शीश अपने प्रिय पुत्र व शिष्य की गोद में रखना पसंद किया। खोजो तो उस बालक का नाम जिसने मातृ-पितृ-गुरू भक्ति की ऐसी पावन मिसाल कायम की।

Wednesday, February 9, 2011

सर्वतीर्थमयी माता... सर्वदेवमयो पिता..

एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा?

निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपति जी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा।
फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया.... दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया.... इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।]

शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की?

गणपतिजीः सर्वतीर्थमयी माता... सर्वदेवमयो पिता... सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं। तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये।

सदगुरु

जितना हो सके, जीवित सदगुरु के सान्निध्य का लाभ लो। वे तुम्हारे अहंकार को काट-छाँटकर तुम्हारे शुद्ध स्वरूप को प्रत्यक्ष करेंगे। उनकी वर्त्तमान हयाती के समय ही उनसे पूरा-पूरा लाभ लेने का प्रयास करो। उनका शरीर छूटने के बाद तो..... ठीक है, मंदिर बनते हैं और दुकानदारियाँ चलती हैं। तुम्हारी गढ़ाई फिर नहीं हो पायेगी। अभी तो वे तुम्हारी – ‘स्वयं को शरीर मानना और दूसरों को भी शरीर मानना’- ऐसी परिच्छिन्न मान्यताओं को छुड़ाते हैं। बाद में कौन छुड़ायेगा?..... बाद में नाम तो होगा साधना का कि मैं साधना करता हूँ, परन्तु मन खेल करेगा, तुम्हें उलझा देगा, जैसे सदियों से उलझाता आया है।

मिट्टी को कुम्हार शत्रु लगता है। पत्थर को शिल्पी शत्रु लगता है क्योंकि वे मिट्टी और पत्थर को चोट पहुँचाते हैं। ऐसे ही गुरु भी चाहे तुम्हें शत्रु जैसे लगें, क्योंकि वे तुम्हारे देहाध्यास पर चोट करते हैं, परन्तु शत्रु होते नहीं। शत्रु जैसे लगें तो भी तुम भूलकर भी उनका दामन मत छोड़ना। तुम धैर्यपूर्वक लगे रहना अपनी साधना में। वे तुम्हें कंचन की तरह तपा-तपाकर अपने स्वरूप में जगा देंगे। तुम्हारा देहाध्यासरूपी मैल धोकर स्वच्छ ब्रह्मपद में तुम्हें स्थिर कर देंगे। वे तुमसे कुछ भी लेते हुए दिखें परन्तु कुछ भी नहीं लेंगे, क्योंकि वे तो सब छोड़कर सदगुरु बने हैं। वे लेंगे तो तुम्हारी परिच्छिन्न मान्यताएँ लेंगे, जो तुम्हें दीन बनाये हुए हैं।

BAM BAM MANTRA JAP SAMARPIT TO PUJYA GURUDEV

Hari om to all

Tomorrow Is the Achla Sapti  , We all are together  Doing the Samuhik Jap Yagya of  BAM BAM BIJ MANTRA  FOR  PUJYA GURUDEV  for  Swasth Swasthya

We kindly invite and request you that tomorrow  all the centers all the samities and all of sadhak bhai bahen  sit to gether  and do the BAM BAM  MANTRA in samuhik way .

WE

Sancalp :

PUJYA GURUDEV KI AYU BADATI RAHE , PUJYA GURUDEV SADEV SAWASTH RAHE ,PUJYA GURUDEV SADEV NIROGI RAHE , PUJYA GURUDEV KI YASH KIRTI SADEV BADTI RAHE , PUJYA GURUDEV KA SATSANG NIRVIGHAN RUP SE JAN JAN TAK  PUHUCHATA RAHE

You all are requested to  sit together , all the centers, Samities and  all the bhai bahen  fine out the time and do the Mantra Jap  BAM BAM   Mantra in Samuhik way  we have to do sava lakh mantra jap  you can divided in memebrs  but if you are doing at your place you all can do 11 mala  , 21 mala ,31 mala or more try to do it samuhic way .

how many malas you are doing just send me the details, Name , City , Nos of Mala  to the worldwideseva@yahoo.com

We hope you all find the Time for the Pujya Gurudev and do the Mantra Jap  and also inform others and inspire them to join in jap

WWST (WORLD WIDE SEVA TEAM ) GURU SEVA HI PARAM DHARAM

Monday, February 7, 2011

मन

मन को अगर अच्छी तरह शिक्षित किया जाय तो वह हमारा बड़ा, भारी में भारी, ऊँचे में ऊँचा मित्र है। सारे विश्व में ऐसा कोई मित्र नहीं हो सकता। इसके विपरीत, मन हमारा भारी में भारी शत्रु भी है। मन जैसा शत्रु सारे विश्व में नहीं हो सकता। मन शत्रु क्यों है ?
मन अगर इन्द्रियों के विकारी सुखों में भटकता रहा तो चौरासी लाख योनियों में युगयुगान्तर तक हमें भटकना पड़ेगा। ऐसा वह खतरनाक शत्रु है।

मन मित्र कैसे है ?

मन अगर तप और परमात्मा के ध्यान की तरफ मुड़ गया तो वह ऐसा मित्र बन जाता है कि करोड़ों-करोड़ों जन्मों के अरबों-अरबों संस्कारों को मिटाकर, इसी जन्म में ज्ञानाग्नि जलाकर, आत्मा-परमात्मा की मुलाकात कराकर मुक्ति का अनुभव करा देता है।

इसलिए शास्त्र कहते हैं किः

मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धनमोक्षयोः।
हमारा मन ही हमारे बन्धन और मोक्ष का कारण बनता है।

Vasant Panchami


4) 8 फरवरी 2011 ( वसंत पंचमी )

माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (8 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।





Vasant Panchami, also known as Magh Shukla Panchami falls in the Hindu calendar month of Magh (January-February). ‘Vasant’ comes from the word ‘spring’ and this festival heralds the beginning of the spring season.

Vasant Panchami is the festival dedicated to Mata Saraswati, the Goddess of learning. It is the birthday of Goddess Saraswati and is a festival full of religious, seasonal and social significance. It is celebrated by Hindus all over the world with verve and great enthusiasm.

Yellow color is given special importance on this day. On Vasant Panchami, Goddess Saraswati is dressed in yellow garments and worshipped (with Puja, Havan etc.). Men and women try to wear yellow clothes on this day. Even the food is colored yellow by using saffron (kesar). Sweetmeats of yellowish hues are exchanged with relations and friends. There is also a custom of ancestor worship, known as ‘Pitri-Tarpan’ in many parts of India during Vasant Panchami.

On this memorable day, Lord Shiva burnt the god of love (kama), Cupid. The gods had sent Cupid to tempt the Lord while he was absorbed in Samadhi, in order to beget a powerful son who would be able to destroy the wicked demon, Tarakasura. Cupid discharged an arrow at Lord Shiva from behind a tree. Lord Shiva became very greatly enraged. He opened His third eye and reduced Cupid to ashes.

One should worship Ma Saraswati in the morning on this day. Ma Saraswati is believed to reside in the books and pens as well. Therefore, these articles too are worshipped on this day. The following widely popular Saraswati Vandana may be recited on this day:

या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता |
या वीणावरदंड मंडितकरा या श्वेत पद्मासना ||

Salutations to the Supreme Goddess Saraswati, whose face is fair as a jasmine flower, luminescent like the moon and delicate as a snow flake; who is dressed in brilliant white (shubhra-) garments (vastraA-). She holds the musical instrument (vINA-) in her hands to bestow boons (varada.nDa-) to her disciples as she sits on her white (shveta-) lotus (padma-) throne (aasanA-). She is dressed in white – the symbol of purity – and rides on a white swan – symbolizing Sattva Guna or purity and discrimination.

Sunday, February 6, 2011

विश्रांति

अपने बच्चे-बच्चियों को अधिक रोक-टोक कर उनको मानसिक दुश्मन मत बनाओ । चौदह साल से ऊपर के बच्चे-बच्चियों से मित्रवत व्यवहार करो, नहीं तो भीतर से वे तुम्हारे शत्रु हो जाऐंगें तो तुम्हारी अच्छी बात भी उनके गले नहीं उतरेंगी । उनमें हजार-हजार कमियां हो सकती हैं लेकिन कोई एक सद्गुण होगा बच्चे में-बच्ची में, आप उसके सद्गुणों को प्रोत्साहित करें और जो आप सद्गुण डालना चाहते उस सद्गुण की थोड़ी महिमा करें ।

जो दूसरे सुख देंगें; इस भाव से काम करते हैं उसके काम बंधनकारी हो जाते हैं, दुःख देने वाले हो जाते हैं । अपना कर्तव्य निभाने के लिए बेटे को, बेटी को, पत्नि को,पति को अपनी सेवा करके संतुष्ट कर दो । महान परमात्मा से ही जुड़े रहने में तेरी महानता है । परमेश्वर के नाते आप मिलो । परमेश्वर के नाते पति की, पत्नि की, मित्रों की, साधक की, संत की, गृहस्थ की सेवा कर लो बस; तो आपको विश्रांति मिलेगी, विश्रांति आपकी माँग है । परमात्मा में विश्रांति से आपका स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन, स्वभाविक हो जाएगा ।